बंदर और खूँटी
बढ़ई एक मंदिर बना रहे थे। खाने के समय वे आधा चिरा हुआ लट्ठा छोड़ गए, जिसमें एक खूँटी लगी थी।
एक शरारती बंदर आया और लट्ठे पर बैठ गया। उसने लकड़ी की खूँटी देखी और खींचने लगा।
वह खींचता रहा, खींचता रहा। आखिर खूँटी "पट" करके निकल गई।
लट्ठा झट से बंद हो गया और उसकी पूँछ दब गई। बंदर चिल्लाया, "आह!"
उस दिन उसने सीखा कि जो काम समझ में न आए, उसे छूना नहीं चाहिए।
जो काम तुम्हारा नहीं है, उसमें टाँग मत अड़ाओ।
अपने काम से कामक्या आप जानते हैं?
आज भी बढ़ई बड़ी लकड़ी चीरते वक्त उसे खुला रखने के लिए खूँटी लगाते हैं।
घर पर यह करके देखें
कोई नई चीज़ छूने से पहले किसी बड़े से पूछो कि वह किस काम की है।
बातचीत के सवाल
कहानी पढ़ने के बाद ये पूछें। हर सवाल के नीचे जवाब दिया है।
बंदर ने क्या खींचा?
जवाब: एक खूँटी
फिर क्या हुआ?
जवाब: लट्ठे में उसकी पूँछ दब गई
इससे क्या सीख मिली?
जवाब: दूसरों के काम में दखल मत दो
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