राजगद्दी पर खड़ाऊँ
भरत ने राम से बहुत विनती की कि वे घर लौटकर राजा बन जाएँ। पर राम ने प्यार से कहा, "मुझे अपना वादा निभाना है और जंगल में ही रहना है।"
तब भरत के मन में एक बहुत सुंदर बात आई। "तो फिर मुझे आपकी खड़ाऊँ दे दीजिए," उन्होंने कहा।
राम मुस्कुराए और उन्होंने अपनी साधारण लकड़ी की खड़ाऊँ भरत को दे दी।
अयोध्या लौटकर भरत ने वे खड़ाऊँ राजगद्दी पर रख दीं। "अब राम की ओर से ये ही राज करेंगी," उन्होंने कहा। "मैं तो बस उनका सेवक हूँ।"
भरत ने राम के नाम पर बहुत सादगी से राज चलाया, और कभी खुद उस गद्दी पर नहीं बैठे।
सादा दिल वाहवाही नहीं ढूँढता, वह दूसरों की सेवा करता है।
सादगीक्या आप जानते हैं?
राम के लौटने तक भरत शहर के बाहर एक छोटी-सी कुटिया में रहकर राज चलाते रहे।
घर पर यह करके देखें
किसी की मदद अच्छे से करो, बिना तारीफ़ की चाह रखे।
बातचीत के सवाल
कहानी पढ़ने के बाद ये पूछें। हर सवाल के नीचे जवाब दिया है।
भरत ने राम से क्या माँगा?
जवाब: उनकी खड़ाऊँ
भरत ने खड़ाऊँ कहाँ रखीं?
जवाब: राजगद्दी पर
भरत ने कैसे राज किया?
जवाब: सादगी से, राम के सेवक बनकर
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